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जानिए हरियाणा के गुड़गांव स्थित शीतला माता मंदिर के बारे में जानकारी

गुड़गांव का नाम आते ही सबसे पहले हमारे जहन में एक बड़ी बड़ी चमकदार ईमारतों वाले शहर की तस्वीर उभरती है। गुड़गांव नाम सुनते ही साइबर सिटी भी हमारे दिमाग में आ जाता है। लेकिन जब हरियाणा, उत्तर प्रदेश विशेषकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान के गांव में आप जब भी गुड़गांव का जिक्र करेंगें अनायास ही लोगों के जहन में गुड़गावां वाली माता आती है। आइये आपको बताते हैं हरियाणा के गुड़गांव स्थित माता शीतला माता मंदिर के बारे में।

शीतला माता मंदिर का महत्व

गुड़गांव स्थित शीतला माता मंदिर में वैसे तो देश भर के श्रद्धालु आते हैं लेकिन ज्यादा संख्या हरियाणा उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान के श्रद्धालुओं की होती है। नवरात्र के दिनों में शीतला माता के मंदिर में भारी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। साल में दो बार चैत्र नवरात्र और आश्विन नवरात्र के समय शीतला माता के इस मंदिर का नजारा अद्भुत होता है। दोनों नवरात्रों में एक महीने तक मेला लगता है। श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगती है,

इस दौरान लगभग 50 लाख श्रद्धालु माता के दर्शन करने आते हैं। माता भी इस समय भक्तों का इम्तिहान लेती हैं जिन्हें मां के दर्शन के लिये घंटों लाइन में खड़े रहना पड़ता है, इसके बाद माता के दर्शन कर भक्त अपने को धन्य समझते हैं। शीतला मां के इस मंदिर की खासियत यह भी है कि श्रद्धालु, नवजात बच्चों का प्रथम मुंडन संस्कार यहीं पर करवाना शुभ मानते हैं।

क्या है शीतला मां की मान्यता

लगभग 500 सालों से यह मन्दिर लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है। यहाँ पर देश के कोने-कोने से लोग पूजा-पाठ के लिए आते हैं। लोगों की मान्यता है कि यहाँ पूजा करने से शरीर पर निकलने वाले दाने, जिन्हें स्थानीय बोलचाल की भाषा में ‘माता’ और विज्ञान में चेचक कहा जाता है, नहीं निकलते हैं।

इसके अलावा नवजात शिशुओं के बालों का प्रथम मुंडन भी यहाँ पर ही होता है। यही कारण है कि हर साल एक माह तक चलने वाले मेले में मुंडन का ठेका 60 लाख से अधिक में छूटता है। ज़िला प्रशासन की तरफ़ से यहाँ पर आने वाले श्रद्धालुओं के लिए खान-पान व सुरक्षा के विशेष बंदोबस्त किए जाते हैं।

शीतला माता मंदिर का इतिहास

सत्रहवीं सदी में महाराजा भरतपुर ने गुड़गाँव में माता कृपि के सती स्थल पर मन्दिर का निर्माण करवाया और सवा किलो सोने की माता कृपी की मूर्ति बनवाकर वहां स्थापित करवायी। कहा जाता है कि बाद में किसी मुगल बादशाह ने मूर्ति को तालाब में गिरवा दिया जिसे बाद में माता के दर्शन के बाद सिंघा भक्त ने निकलवाया। बताया जाता है कि सिंघा भगत के तप को देखकर क्षेत्रीय लोग उनके पांव पूजने लगे थे।

मूर्ति की स्थापना को लेकर ही एक अन्य रोचक किस्सा कुछ यूं है गुड़गांव से थोड़ी दूर है फर्रुख नगर वहां के एक बढ़ई की कन्या बहुत सुंदर थी। दिल्ली के तत्कालीन बादशाह तक उसकी सुंदरता का जिक्र पहुंच गया। बादशाह ने विवाह की इच्छा प्रकट की लेकिन लड़की के पिता को विधर्मी बादशाह से बेटी की शादी मंजूर नहीं थी। उसने भरतपुर के महाराज सूरजमल से इसकी फरियाद की लेकिन दूसरे राज्य का मसला बताकर उसे टाल दिया।

जब मायूस होकर वह लौट रहा था तो युवराज से उसकी मुलाकात हुई और उसने युवराज के आगे गुहार लगाई। इस पर युवराज ने पिता के खिलाफ जाकर विद्रोह करते हुए दिल्ली पर आक्रमण किया उसने आक्रमण से पहले गुड़गांव में माता से विजय की मन्नत मांगी और माता के मढ़ को पक्का करवाने का संकल्प लिया। विजयी होने के बाद उसने यहां पर माता का पक्का मढ़ बनवाया।

पौराणिकता

गुड़गाँव के शीतला माता मन्दिर की कहानी महाभारत काल से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि महाभारत काल में यहाँ आचार्य द्रोणाचार्य कौरवों और पाण्डवों को अस्त्र-शस्त्र आदि का प्रशिक्षण देते थे। कहते हैं कि जब गुरु द्रोण महाभारत के युद्ध में द्रुपद पुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा वीरगति को प्राप्त हुए, तो उनकी पत्नी कृपि अपने पति के साथ सती होने के लिए तैयार हुई।

कृपि महर्षि शरद्वान की पुत्री तथा कृपाचार्य की बहन थी। जब कृपि ने 16 श्रृंगार कर सती होने की प्रथा निभाने के लिए अपने पति की चिता पर बैठना चाहा, तो लोगों ने उनको सती होने से रोका; लेकिन माता कृपि सती होने का निश्चय करके अपने पति की चिता पर बैठ गईं। उन्होंने लोगों को आशीर्वाद दिया कि मेरे इस सती स्थल पर जो भी अपनी मनोकामना लेकर पहुँचेगा, उसकी मनोकामना पूर्ण होगी।

ऐतिहासिक तथ्य

सन 1650 में महाराजा भरतपुर ने गुड़गाँव में जहाँ माता कृपि सती हुई थीं, मन्दिर बनवाया और सवा किलो सोने की माता कृपि की मूर्ति बनवाकर वहाँ स्थापित की। इस मन्दिर में आज भी भारत के कोने-कोने से लाखों की संख्या में भक्त स्त्री-पुरुष अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए आते हैं। चैत्र मास के नवरात्रों, वैशाख और आषाढ़ के सम्पूर्ण मास तथा आश्विन के नवरात्रों में भारी मेला लगता है, जिसमें कम से कम 50 लाख यात्री दर्शनाथ आते हैं। यह मन्दिर 500 गज के क्षेत्र में बना हुआ है।

यात्री सुविधा

हरियाणा प्रशासन ने मेले की सुरक्षा व सुविधाओं के लिए अलग से ‘शीतला माता श्राइन बोर्ड’ का गठन किया हुआ है, जिसकी देख-रेख में मेले के सभी कार्य होते हैं। यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं में सबसे अधिक तादाद उत्तर प्रदेश, राजस्थान व हरियाणा के लोगों की होती है। इसके अलावा देश के सभी प्रदेशों से श्रद्धालु यहाँ पर मन्नतें माँगने आते हैं। नवरात्रों में शीतला माता मन्दिर का नज़ारा कुछ अलग होता है। इन दिनों यहाँ पर दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं में कई प्रदेशों से लोग आते हैं।

 

ख़ासकर पश्चिम उत्तर प्रदेश के लोग सबसे अधिक शीतला माता को मानते हैं। शहर के बीचों-बीच स्थित शीतला माता मन्दिर पर जाने के लिए श्रद्धालुओं को अधिक परेशानी का सामना भी नहीं करना पड़ता। मुख्य बस स्टैंड व रेलवे स्टेशन के बीच स्थित होने की वजह से श्रद्धालु आसानी से मन्दिर परिसर तक पहुँच सकते हैं। इसके अलावा अपने वाहनों से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए मेले परिसर में पार्किंग आदि की विशेष व्यवस्था भी रहती है।

शीतला माता मन्दिर पता, टाइमिंग

पता : सेक्टर -6, शीतला माता रोड, गुड़गांव रेलवे स्टेशन के पास, गुड़गांव, हरियाणा

टाइमिंग : सुबह 6 बजे से शाम 8 बजे तक खुला रहता है

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