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जानिए कहां है पूरे एशिया महाद्वीप बना एकमात्र बहाई धर्म का प्रार्थना केंद्र है ‘कमल मंदिर’

दक्षिण दिल्ली के प्रसिद्ध इमारतों व मंदिरों में से एक है कलकाजी स्थित ‘कमल मंदिर’। ये अपने में ही बेहद ही अनोखा मंदिर है… कमल मंदिर में किसी भगवान की मूर्ति स्थापित नहीं है और न ही और मंदिरों की तरह इस मंदिर में धार्मिक कर्म-कांड होते है… लेकिन फिर भी यह धार्मिल स्थलों में से एक है। कमल मंदिर में विभिन्न धर्मों से संबंधित विभिन्न पवित्र लेख पढ़े जाते हैं। इस मंदिर की आकृति कमल के फूल की तरह है।

कमल मंदिर 19वीं सदी के ईरान में सन् 1844 में स्थापित नए धर्म ‘बहाई धर्म’ का है। यह एशिया महाद्वीप में बना एकमात्र बहाई प्रार्थना केंद्र है। बहाई धर्म का मानना है कि सम्पूर्ण मानव जाति एक है।
दिल्ली के कमल मंदिर ने बहुत से आर्किटेक्चरल अवॉर्ड भी अपने नाम किये है। इस मंदिर में 27 खड़ी मार्बल की पंखुड़ियां बनी हुई हैं, जिसे 3 और 9 के आकार में बनाया गया है। इसके साथ इसके प्रवेश हॉल में 9 दरवाजे बनाये गए है, जोकि तकरीबन 40 मीटर के हैं। मंदिर के अंदर हॉल में तकरीबन 2400 लोग एकसाथ-एक समय पर बैठ सकते हैं।

कमल मंदिर की खासियत

कमल मंदिर की खासियत

कमल मंदिर की खासियत

-इस मंदिर का आकार कमल के फुल की तरह है क्योकि कमल को शांति, शुद्धता, प्यार और पवित्रता का प्रतिक माना जाता है।

– आस्था और श्रद्धा का सबसे महत्वपूर्ण मंदिर है कमल मंदिर।

-बहाई धर्म (विभिन्न धर्मों और पंथों की एकमात्र आधारशिला) की स्थापना बहा-उल्लाह ने की थी, जो की तेहरान के पर्शियन अमीर आदमी थे। बहाई धर्म के अनुसार भगवान केवल एक ही है।

-इस मंदिर को बनाने में एक दशक से भी ज्यादा का समय लगा है। अंततः 1986 में यह मंदिर सामान्य लोगो के लिये खुला।

-कमल मंदिर को तक़रीबन 700 इंजिनियर, तकनीशियन (Technician), कामगार और कलाकारों ने मिलकर बनाया।

-ये मंदिर तक़रीबन 40 मीटर लंबा और 9 तालाब से घिरा हुआ है।

-इस मंदिर को बनाने में जिस मार्बल का उपयोग किया गया है, जोकि ग्रीस से मंगवाया गया था।

-कमल मंदिर को कनाडा के पर्शियन आर्किटेक्ट फरिबोर्ज़ सहबा ने डिजाईन किया था।

मंदिर का उद्घाटन 24 दिसंबर 1986 को किया गया था, लेकिन आम जनता के लिए इसे 1 जनवरी 1987 में खोला गया। मंदिर के निर्माण में 10 साल लगे थे। यह मंदिर तकरीबन 25 एकड़ में फैला हुआ है। जब से लेकर आज तक यहा रोजाना हजारों व लाखों की संख्या में देशी-विदेशी  लोग घूमने आते हैं। इस मंदिर का निर्माण वास्तुकार फरीबर्ज सहबा ने किया था।

भारत में बहाई धर्म

भारत, बहाई धर्म से इसके उद्भव सन 1844 से ही जुड़ा हुआ है, जिन 18 पवित्र आत्माओं ने ‘महात्मा बाब’, जो कि ‘भगवान बहाउल्लाह’ के अग्रदूत थे, को पहचाना और स्वीकार किया था, उन में से एक व्यक्ति भारत से थे।

आज लगभग 20 लाख बहाई, भारत देश की महान विविधता का प्रतिनिधित्व, भारत के हर प्रदेश में 10,000 से भी अधिक जगहों पर रहते हुए कर रहे हैं।

“बहाउल्लाह” (1817-1892) बहाई धर्म के ईश्वरीय अवतार हैं। उन्हें बहाईयों द्वारा इस युग के दैवीय शिक्षक तथा ईश्वरीय अवतारों की कड़ी में सबसे नए अवतार, के रूप में माना जाता है जिन्होंने इस पृथ्वी के निवासियों को अपने दैवीय ज्ञान से प्रकाशित किया है। इस कड़ी में अब्राहम, मोज़ेज, भगवान बुद्ध, श्री कृष्ण, ज़ोरास्टर, ईसा-मसीह और मुहम्मद जैसे दैवीय शिक्षक थे।

“बहाउल्लाह” के सन्देश की मुख्य अवधारणा थी कि सम्पूर्ण मानव एक जाति है और वह समय आ गया है, जब वह एक वैश्विक समाज में बदल जाये। “बहाउल्लाह” के अनुसार जो सबसे बड़ी चुनौती इस पृथ्वी के नागरिक झेल रहे है,वह है उनके द्वारा अपनी एकता को स्वीकार करना और उस सम्पूर्ण मानवजाति की एकता की प्रक्रिया में अपना योगदान देकर सदैव प्रगति करने वाली सभ्यता को आगे बढ़ाना है।”

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