Browse By

जानिए क्या है दिल्ली का ऐतिहासिक ‘लूडलो केसल’, आज स्कूल के नाम से है प्रसिद्द

दिल्ली स्थित लूडलो केसल एक ऐतिहासिक इमारत है जो दिल्ली के सिविल लाइन्स पर स्थित है। ये इमारत ईस्ट इंडिया कंपनी की देन है जिसे लगभग 19वीं शताब्दी से पहले ब्रिटिश हुकुमत द्वारा बनवाया गया था। उस दौर ये मुगल न्यायलय के ब्रिटिश राजनीतिक एंजेट के आवास के रुप में काम करता था और उत्तर- पश्चिम प्रांतो के हेडक्वार्टर के रुप में जाना जाता था।

जैसा की हम सभी को मालूम है कि भारत पर कई शासकों द्वारा राज  किया गया था। इनमें जहां मुगल वंश से लेकर लोधी साम्राज्य रहा तो वहीं इंग्लेंड की ब्रिटिश ईस्ट कंपनी ने भी भारत पर अपना अधिक्रमण जताया।

भारत के विभिन्न राज्यों में आज भी इन शासकों द्वारा निर्मित इमारते और भवन दिखाई देते है। आज इन्हीं मेंं से एक भवन की जानकारी आपको देने जा रहे है जिसे लूडलो केसल कहा जााता है। इसके नाम के पीछे भी दिलचस्प कहानी छूपी है तो चलिए जानते है,,,।

लूडलो केसल एक ऐतिहासिक इमारत  

लूड्लो केसल

लूड्लो केसल

1831 के दौरान लूड्लो केसल, रेसिडेन्सी सर्जन के शमूएल लूडलो का एक घर हुआ करता था। यह इमारत तब भी रेजीडेंसी इमारत के तौर पर जानी जाती थी।1857 के बाद-ब्रिटिश राज के पहले कुछ दशकों में लूडलो केसल मुख्य आयुक्त का घर रहा। इसी दौरान दिल्ली क्षेत्र, पंजाब प्रांत का एक हिस्सा बन गया था। यह वह समय था जब इमारत में कई मेहमानों समेत पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति यलेसिस एस ग्रांट मौजूद रहे थे। 

कौन थे शमूएल लूडलो

शमूएल लूडलो एक ब्रिटिश सर्जन थे ईस्ट इंडिया कंपनी में । जिनकी मृत्यु साल 1853 में हुई थी। लूडलो ने अपनी जिंदगी के कई साल दिल्ली में बिताए थे। लूडलो ने 19वीं शताब्दी से पहले ब्रिटिश भारत में बंगाल प्रेसीडेंसी के रुप में काम किया था। इस दौरान लुडलो ने ब्रिटिश निवास का मुख्यालय कहा जाने वाले मुगल न्यायालय में कई साल निवास किया। यह निवास करीब 1803 के कुछ समय बाद बनाया गया था।

क्यों हुए प्रसिद्द शमूएल लूडलो

दरअसल पुरानी दिल्ली के बाहर सिविल लाइन्स में  लुडलो द्वारा एक भवन का निर्माण किया गया था। जिसका नाम लूडलो केसल रखा गया। दिलचस्प वाली बात यह है कि यह नाम शमूएल लूडलो ने अपने सरनेम के आधार पर रखा जो बाद में काफी प्रसिद्ध हुआ।

इमारत की भुजाएं और इसकी सजावट crenelations द्वारा की गई थी। सितंबर 1857 में, शहर की दीवार को तोड़ने और शहर को फिर से स्थापित करने के लिए दिल्ली की घेराबंदी की गई। इस दौरान यह इमारत ब्रिटिश सैनिकों द्वारा उपयोग की जाने वाली साइट बन गई।

शमूएल लूडलो के नाम पर लुडलो कैसल

दरअसल यह इमारत शमूएल लुडलो के सरनेम पर आधारित है। शमूएल लुडलो द्वारा ही इस भवन का निर्माण किया गया था। शमूएल 1813 के दौरान दिल्ली आए थे। बता दें सन् 1817 में लूडलो को पूर्व सैनिक कंपनी और बंगाल प्रेसिडेंसी मेडिकल इंस्टीट्यूट में सहायक सर्जन से पूर्ण सर्जन और प्रेसीडेंसी सर्जन में पदोन्नत किया गया था। वहीं सन् 1831 में, लुडलो को अधीक्षक सर्जन में पदोन्नत किया गया और साथ ही दिल्ली से ट्रांसफर किया गया।

पहले प्रधानमंत्री की शादी पार्टी का गवाह लूडलो केसल

जवाहर लाल नेहरु शादी पार्टी

जवाहर लाल नेहरु शादी पार्टी

19वीं शताब्दी के दौरान और 20वीं शताब्दी से पहले यह इमारत दिल्ली क्लब में शामिल हो गई। 1916 में यहां जवाहरलाल नेहरु की शादी की पार्टी आयोजित की गई थी। वहीं 1947 में भारत की आजादी के बाद लूडलो केसल को उच्च विद्यालय में बदल दिया गया। इसके बाद 1960 के दशक में स्कूल को बड़े पैमाने पर स्थापित करने के लिए इमारत को ध्वस्त किया गया।

जिसके बाद यह सरकारी मॉडल सीनियर सैकेंडरी स्कूल के रुप में जाना जाने लगा। लेकिन आज भी लोग इसे लुडलो कैसल के नाम से जल्दी समझ लेते है। अगर आप गुगल या किसी वेबसाइट पर इसकी भवन की तलाश करेंगे तो शायद ही आप इसे खोज पाएं क्योंकि अब यह दिल्ली स्कूल के रुप ज्यादा प्रख्यात है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *